दौसाराजस्थान

एक सर्जिकल स्ट्राइक भारत में रह रहे गद्दारों पर होनी चाहिए:– हरितवाल

रिपोर्टर: दीपक शर्मा बामनवास

दौसा। भाजपा जिला मीडिया प्रभारी प्रेम हरितवाल ने कहा दिल्ली लाल किले के पास बम विस्फोट आतंकी हमला नहीं था ये सभी के सभी भारतीय थे,सभी मुस्लिम थे और सभी पढ़े लिखे गद्दार डॉक्टर थे अब समय आ गया है देश के गद्दारों को पहचान कर उनका सफाया करने का देश के भीतर रह रहे इन गद्दारों द्वारा भारत के विभिन्न राज्यों में रॉकेट और ड्रोन से बड़े हमलों की तैयारी चल रही थी, 50 शहरों में एक साथ धमाके करने की योजना बन चुकी थी, 32 गाड़ियाँ तैयार थीं और उनमें भरने के लिए 32 क्विंटल RDX तक इकट्ठा कर लिया गया था। छह राज्यों में छापेमारी जारी है, NIA अभी भी दौड़ रही है—लेकिन असली सवाल यही है कि इसका स्थायी समाधान क्या है? क्या हम अग्नि, ब्रह्मोस, परमाणु और हाइड्रोजन बम से इस आंतरिक जिहाद को खत्म कर सकते हैं? नहीं। क्योंकि ये हथियार बाहरी दुश्मनों के लिए हैं, और दुश्मन आज देश के भीतर बैठा है।जब डॉक्टर आतंकवादी बन सकता तो पायलेट ट्रेन ड्राइवर स्टेशन मास्टर इनके हाथ में हजारों लोगों की जान होती है या बारात मे खाना बनाने वाला अगर भोजन में जहर मिला दे तो एक साथ कम से कम 500 लोगों को तो मार ही सकता है ऐसी स्थिति में भरोसा किस पर किया जाए? सुबह से शाम तक यही खबरें—यहाँ इतना पकड़ लिया गया, वहाँ इतना पकड़ लिया गया—लेकिन यह कभी नहीं पूछा जाता कि इस समस्या का स्थायी समाधान क्या है।

भारत को गिरफ़्तारियों की संख्या नहीं, बल्कि एक ऐसा कठोर सिस्टम चाहिए जो इस जिहादी तंत्र को जड़ से काट दे। और यदि भारत को बचाना है तो अब एक 20 सूत्रीय निर्णायक कार्यक्रम लागू करना ही पड़ेगा, नहीं तो भारत का भविष्य वही होगा जो पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और बांग्लादेश भुगत चुके हैं।
भारत को बचाना है तो सबसे पहले मदरसों को बंद कर समान शिक्षा लागू करनी होगी, मजहब के आधार पर चलने वाले बोर्ड, ट्रिब्यूनल, योजनाएँ, कॉलेज, विश्वविद्यालय—सब पर पूर्ण विराम लगाना पड़ेगा। अल्पसंख्यक–बहुसंख्यक का खेल खत्म करना पड़ेगा। माइनॉरिटी कमीशन, माइनॉरिटी अफेयर्स मिनिस्ट्री, मजहब के नाम पर चलने वाले लोन, वजीफे, फंडिंग—यह सब बंद करना ही भारत की सुरक्षा का पहला कदम है। अल-फलाह जैसी एक यूनिवर्सिटी पकड़ी गई है, जबकि देश में ऐसी दर्जनों यूनिवर्सिटियाँ और चल रही हैं; जामिया और अलीगढ़ के बारे मे बताने की जरूरत नहीं इसे अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता।
आज जो नेता, , पत्रकार, बुद्धिजीवी “संविधान बचाओ” की आड़ में आतंकियों के लिए कवच बनने दौड़ जाते हैं, सबसे पहले उन्ही को जेल में डालने की जरूरत है। अमेरिका जैसा आधुनिक फेडरल पीनल कोड जब वहाँ लागू हो सकता है, तो भारत 1860 अंग्रेजो की सोच वाले घटिया कानून की डेंटिंग–पेंटिंग कर के कब तक इसे ढोता रहेगा? लव जिहाद को राष्ट्र-सुरक्षा पर खतरा घोषित करना ही पड़ेगा; इसे कानून में अलग अध्याय के रूप में जोड़ना पड़ेगा। यही नियम लैंड जिहाद, धर्मांतरण और घुसपैठ पर लागू होंगे—ये सब जघन्य अपराध घोषित हों। जनसंख्या विस्फोट को बम विस्फोट से बड़ा खतरा मानकर कठोर कानून बने—तीसरा बच्चा चेतावनी, चौथा बच्चा हुए तो नागरिकता समाप्त और दस वर्ष की सज़ा; यह कदम नहीं उठा तो 20 वर्षों बाद भारत का स्वरूप बदल चुका होगा।

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भारत को बचाना है तो “जस्टिस विदिन ए ईयर” नया न्यायिक सिद्धांत बनाना ही पड़ेगा। जिहाद, घुसपैठ, धर्मांतरण, लैंड-जिहाद, लव-जिहाद, ड्रग-तस्करी—इनमें से कोई भी समस्या बहस से नहीं रुकती; कठोर कानूनी प्रहार ही समाधान है। यदि यह कानून लागू हुए, तो मैं पूरे विश्वास के साथ कहता हूँ कि ये सारी समस्याएँ एक साल में 90% खत्म हो जाएँगी। लेकिन इसके लिए जनता को पार्टियों की गुलामी छोड़नी होगी। गांधीवाद, समाजवाद, लोहिया, अंबेडकरवाद, पेरियारवाद—ये सब जनता को बाँटने और अंधेरे में रखने के औज़ार बन चुके हैं। आज के नेता–अभिनेता–पत्रकार विदेशों में अपनी जायदादें जोड़ रहे हैं; संकट आएगा तो वे लंदन–कनाडा–ऑस्ट्रेलिया भाग जाएँगे, और भुगतना आपके बच्चों को पड़ेगा। यही कारण है कि पार्टी की गुलामी छोड़कर केवल देश की सोचनी होगी, कठोर कानूनों की माँग करनी होगी और उन दलालों को पूरी तरह नकारना होगा जो भारत के भीतर जिहाद को कवर फायर देते हैं। यदि भारत को बचाना है, संस्कृति को बचाना है, अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित रखना है—तो अब सिर्फ़ एक ही मार्ग है: कठोरता, स्पष्टता, और राष्ट्रहित सर्वोपरि।

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